शनिवार, 15 जून 2013

कैसे तुम्हें रिझाऊँ

हम सब चाहते हैं कि भगवान हमसे रीझ जांय । पर ऐसा होता नहीं है । ऐसा क्यों है ? क्या भगवान रीझना ही नहीं चाहते ? अथवा क्या भगवान बदल गए हैं ? ऐसा तो बिल्कुल नहीं है-

करुणासागर की करुणा में कमी नहीं कोई आई है ।
न ही राघव ने अपनी विरद की रीति भुलाई है ।।

आखिर तब क्या कारण है ? कहते हैं कि ‘रोपा पेड़ बबूल का आम कहाँ से खाय’ । बबूल का पेड़ लगाकर आम खाना चाहो तो यह कहाँ सम्भव है ? आम खाना हो तो बबूल नहीं आम का ही पेड़ लगाना पड़ेगा । ठीक ऐसे ही हम लाख चाहें कि भगवान हमसे रीझ जांए तो ऐसा बिल्कुल नहीं होगा जबतक हम इसके अनुरूप काम न करें ।


   कुछ ऐसा है जिससे रघुनाथ जी रीझ जाते हैं । तभी तो शबरी, जटायु, केवट, कोल-किरात-भील और बानर-भालुओं से रामजी रीझ गए थे । हमें तो लगता है कि हमारे अंदर एक भी गुण ऐसा नहीं है जिससे रामजी रीझ सकें । इन गुणों को कैसे अपने अंदर उतारू , यह भी हम नहीं जानते । ऐसे में यदि रघुनाथजी ही कुछ करें तभी काम बन सकता है अथवा नहीं ।


 संतो ने समझ-बूझ कर बहुत कुछ करने को कहा है । ग्रंथो ने भी रास्ते दिखाए हैं । अंततः सभी का यही निर्णय मालुम पड़ता है कि जिस पर रघुनाथ जी की अहैतुकी कृपा हो जाय अर्थात जिससे रामजी रीझना चाहें उसी पर रीझ जाते है । जतनों का क्या भरोसा ?


   गोस्वामीजी ने कहा है कि कई संत-महात्मा आजीवन नाना जतन करते रहते हैं फिर भी अंत समय में राम नाम भी मुँह से नहीं निकल पाता है । वहीं दूसरी ओर कोलों-किरातों व भीलों ने क्या किया था ? गीध जटायु ने क्या किया था ? बानरों और भालुओं ने क्या किया था ? इनको रामजी ने अपना लिया । ऐसे में कहना पड़ता है कि प्रभुजी जिसको अपनी ओर से कृपा करके अपना लें वहीं उनका हो सकता है ।


   फिर भी हमें कुछ न कुछ तो करना ही होगा । हाथ पर हाथ रखकर बैठने से काम थोड़े बनेगा । न ही यह कहने से काम चलेगा कि यदि रामजी को रीझना होगा तो रीझ ही जायेंगे हम क्या करें ? हमें प्रयास करते रहना है ।  अपने अंदर उन गुणों को उतारना होगा जिससे केवट, गीध जटायु और शबरी आदि से भगवान रीझ गए थे

              
 ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

भक्ति-भाव न मेरे, भाव कहाँ से पाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

गुन हैं एक न मेरे, गुन मैं कहाँ से लाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

करम शुभाशुभ घेरे,  कैसे इन्हें भगाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

पाप बुद्धि है मेरी, कैसे स्वच्छ बनाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

मन चंचल है मेरा, कैसे इसे टिकाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

दशरथ सी आसक्ति प्रभूजी मैं कैसे उपजाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

मातु कौसल्या जैसे प्रभूजी कैसे लाड लडाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

लक्ष्मण जैसा भाव समर्पण पामर कर न सकाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

त्याग भरत सा नेह चरण में कैसे नाथ लगाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

रिपुहन जैसी प्रीति सादगी रघुवर कहाँ से लाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

सीता जैसे जीवन अपना कैसे तुम्हें बनाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

केवट सा अनुराग नाथ मैं कैसे हिय जगाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

जटायु जैसी भाग प्रभूजी कैसे भाग लिखाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

शबरी सा विश्वास भगति नव कैसे मैं उपजाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

हनुमत जैसे राम लखन सिय कैसे हिय बसाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

भोले शंकर जैसे मन को कैसे राम रमाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

तुलसी जैसा ध्यान प्रभू बिन ज्ञान कहाँ से लाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

करनी अपनी समुझि-समुझि प्रभु मैं तो लाज लजाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

जनमि-जनमि बहु दूर हुए हम पास में कैसे आऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

जैसे-तैसे जो भी बनता गुन तेरे ही गाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।

संतोष समुझि गुनगन की करनी विरद ते आस लगाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।








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