हम सब चाहते हैं कि भगवान हमसे रीझ जांय ।
पर ऐसा होता नहीं है । ऐसा क्यों है ? क्या भगवान रीझना ही नहीं चाहते ? अथवा क्या
भगवान बदल गए हैं ? ऐसा तो बिल्कुल नहीं है-
करुणासागर की करुणा
में कमी नहीं कोई आई है ।
न ही राघव ने अपनी
विरद की रीति भुलाई है ।।
आखिर तब क्या कारण है ? कहते हैं कि ‘रोपा
पेड़ बबूल का आम कहाँ से खाय’ । बबूल का पेड़ लगाकर आम खाना चाहो तो यह कहाँ सम्भव
है ? आम खाना हो तो बबूल नहीं आम का ही पेड़ लगाना पड़ेगा । ठीक ऐसे ही हम लाख चाहें
कि भगवान हमसे रीझ जांए तो ऐसा बिल्कुल नहीं होगा जबतक हम इसके अनुरूप काम न करें ।
कुछ ऐसा है जिससे रघुनाथ जी रीझ जाते हैं । तभी तो शबरी, जटायु, केवट,
कोल-किरात-भील और बानर-भालुओं से रामजी रीझ गए थे । हमें तो लगता है कि हमारे अंदर
एक भी गुण ऐसा नहीं है जिससे रामजी रीझ सकें । इन गुणों को कैसे अपने अंदर उतारू ,
यह भी हम नहीं जानते । ऐसे में यदि रघुनाथजी ही कुछ करें तभी काम बन सकता है अथवा
नहीं ।
संतो ने समझ-बूझ कर बहुत कुछ करने को कहा है ।
ग्रंथो ने भी रास्ते दिखाए हैं । अंततः सभी का यही निर्णय मालुम पड़ता है कि जिस पर
रघुनाथ जी की अहैतुकी कृपा हो जाय अर्थात जिससे रामजी रीझना चाहें उसी पर रीझ जाते
है । जतनों का क्या भरोसा ?
गोस्वामीजी ने कहा है कि कई संत-महात्मा आजीवन
नाना जतन करते रहते हैं फिर भी अंत समय में राम नाम भी मुँह से नहीं निकल पाता है ।
वहीं दूसरी ओर कोलों-किरातों व भीलों ने क्या किया था ? गीध जटायु ने क्या किया था
? बानरों और भालुओं ने क्या किया था ? इनको रामजी ने अपना लिया । ऐसे में कहना
पड़ता है कि प्रभुजी जिसको अपनी ओर से कृपा करके अपना लें वहीं उनका हो सकता है ।
फिर भी हमें कुछ न कुछ तो करना ही होगा । हाथ पर हाथ रखकर बैठने से काम
थोड़े बनेगा । न ही यह कहने से काम चलेगा कि यदि रामजी को रीझना होगा तो रीझ ही
जायेंगे हम क्या करें ? हमें प्रयास करते रहना है । अपने अंदर उन गुणों को उतारना होगा जिससे केवट,
गीध जटायु और शबरी आदि से भगवान रीझ गए थे –
ओ
मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।
भक्ति-भाव न मेरे, भाव कहाँ से पाऊँ । ओ
मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।
गुन हैं एक न मेरे, गुन मैं कहाँ से लाऊँ ।
ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।
करम शुभाशुभ घेरे, कैसे इन्हें भगाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे
तुम्हें रिझाऊँ ।
पाप बुद्धि है मेरी, कैसे स्वच्छ बनाऊँ ।
ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।
मन चंचल है मेरा, कैसे इसे टिकाऊँ । ओ
मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।
दशरथ सी आसक्ति प्रभूजी मैं कैसे उपजाऊँ ।
ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।
मातु कौसल्या जैसे प्रभूजी कैसे लाड लडाऊँ
। ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।
लक्ष्मण जैसा भाव समर्पण पामर कर न सकाऊँ ।
ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।
त्याग भरत सा नेह चरण में कैसे नाथ लगाऊँ ।
ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।
रिपुहन जैसी प्रीति सादगी रघुवर कहाँ से
लाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।
सीता जैसे जीवन अपना कैसे तुम्हें बनाऊँ ।
ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।
केवट सा अनुराग नाथ मैं कैसे हिय जगाऊँ ।
ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।
जटायु जैसी भाग प्रभूजी कैसे भाग लिखाऊँ ।
ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।
शबरी सा विश्वास भगति नव कैसे मैं उपजाऊँ ।
ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।
हनुमत जैसे राम लखन सिय कैसे हिय बसाऊँ ।
ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।
भोले शंकर जैसे मन को कैसे राम रमाऊँ । ओ
मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।
तुलसी जैसा ध्यान प्रभू बिन ज्ञान कहाँ से
लाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।
करनी अपनी समुझि-समुझि प्रभु मैं तो लाज
लजाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।
जनमि-जनमि बहु दूर हुए हम पास में कैसे
आऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।
जैसे-तैसे जो भी बनता गुन तेरे ही गाऊँ ।
ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।
संतोष समुझि गुनगन की करनी विरद ते आस
लगाऊँ । ओ मेरे रघुनाथ मैं कैसे तुम्हें रिझाऊँ ।